राष्ट्रीय हथकरघा दिवस विशेष लेख

वैसे तो स्वदेशी और स्वावलंबन को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष दिन कि आवश्यक्ता नहीं है यह तो एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह भावना हमारे मन में निरंतर तभी बनी रहेगी जब स्वदेशी और स्वावलंबन को न केवल हमारी शिक्षा में, अपितु हमारी जीवन शैली में भी स्थान मिलेगा। पिछले पांच-सात वर्षों में इस दिशा में बहुत सकारात्मक कार्य हुए हैं किंतु यह बहुत धीमी प्रक्रिया है अतः थोड़ा ज्यादा समय लेगी। संतोष इस बात का है कि सही दिशा में धीमी गति से चलने पर भी लक्ष्य कि ओर ही कदम बढ़ेंगे।

इतिहास पढ़ने से सहज रुप से ही ज्ञात हो जाता है कि हथकरघा भारतीय कला, परंपरा और संस्कृति का अभिन्न अंग है। दुर्भाग्यवश आज कि युवा पीढ़ी इस इतिहास से वंचित है।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का ऐतिहासिक महत्व

7 अगस्त, 1905 को कोलकाता के टाउनहाल में एक जनसभा में स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक शुरुआत की गई थी। इस आंदोलन में घरेलू उत्पादों और उत्पादन प्रक्रियाओं का पुनरोत्थान शामिल था। भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई, 2015 को इस आंदोलन की याद में प्रतिवर्ष 7 अगस्त को ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की गई थी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य हथकरघा उद्योग के महत्व एवं आमतौर पर देश के सामाजिक, आर्थिक विकास में इसके योगदान के बारे में जागरूकता फैलाना है। हथकरघा उत्पाद जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी को रोजगार मुहैया कराते हैं वहीं यह पर्यावरण के अनुकूल भी है।

पिछले एक दशक में जिस आर्थिक संकट ने दुनिया को घेरा है उसने सभी विकसित देशों को विकेंद्रियकृत अर्थव्यवस्था की ओर आकर्षित किया है। विकेंद्रियकृत अर्थव्यवस्था का अर्थ है "स्थानीय खपत के लिए स्थानीय उत्पादन" (Local Production for Local Consumption)। स्थानीय उत्पादन, आवश्यक्ताओं के आधार पर किया जाता है। मनुष्य कि मूलभूत आवश्यक्ताओं पर ध्यान दें तो, रोटी और कपड़ा के आधार पर खेती और हथकरघा, भारत जैसी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। पिछले पांच-छः दशकों में बदली सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर यह कहा जा सकता कि बहुतायत किसानों के पास छोटी-छोटी भूमियां बचीं हैं और बहुत सारे किसान मजदूरों में भी बदल गए। ऐसे में हथकरघा जैसे उपक्रम के माध्यम से इन्हें गांवों में ही रोजगार मुहैया कराया जा सकता है।

हथकरघा के वस्त्र सामान्य तौर पर मंहगे रहते हैं किंतु यदि इसकि "उत्पादन एवं मूल्य श्रृंखला" (production and value chain) पर युक्ति पूर्वक कार्य किया जाए तो अवश्य ही इन्हें जनसामान्य तक पहुंचाया जा सकता है। खैर, यह तो शोध और प्रयोग का विषय है।

श्रमदान ऐसे ही एक प्रयोग का नाम है। लगभग तीन वर्ष पहले जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आर्शीवाद से प्रारंभ यह प्रयोग अल्प समय में ही बहुत से ग्रामीण युवाओं के जीवन में आमूल चूल परिवर्तन लाने में सफल रहा है। आईए साक्षात्कार करतें हैं ऐसे ही एक युवक जाहर पाल के जीवन से –